कभी-कभी ज़िंदगी आवाज़ नहीं देती… 
बस रोक लेती है।

Ortir India

- एक शाम, एक सफर

उस शाम मैं रोज़ की तरह टहलने निकली थी।
दिल्ली की हवाओं में दीवाली की ख़ुशबू थी -
सड़कें रोशनी से सजी,
लोगों की हँसी, खरीदारी की हलचल,
हर तरफ़ चकाचौंध।

लेकिन उसी जगमगाहट में,
एक अजीब-सी ख़ामोशी थी -
जैसे उत्सव के बीच कोई अनकही उदासी खड़ी हो।
कदम अपने-आप रुक गए, बिना वजह…

मानो ज़िंदगी ने मेरे हाथ पकड़ लिए हों और कहा हो -
“यहीं ठहरो, कुछ देखना है।”

एक ठहराव - एक मुलाक़ात

एक पेड़ के नीचे ज़मीन पर फैला था सादगी से जन्मा कला का संसार -
हस्तनिर्मित छोटी-छोटी चीज़ें,
बिना चमक, बिना शोर, बिना तामझाम…

और उनके पास बैठी थी गीता।
साधारण साड़ी, थका चेहरा, बुझी आँखें -
गुजरात से आई थी रोज़गार की आस में।

उसकी आँखें बोल नहीं रहीं थीं,
पर चीख रही थीं - बच्चों की उम्मीदें,
उसका संघर्ष, उसका मौन-सा साहस…

मानो कह रहा हो -
“थोड़ा सा बिकने की इच्छा नहीं…
बस थोड़ा सा जीने का सपना है।”

एक खामोशी - एक सच

मैं उसके पास खड़ी रही, बिना कुछ पूछे।
वो भी चुप, मैं भी चुप।

पर उस चुप्पी में जितना कहा गया,
वो शायद शब्दों में कभी नहीं कहा जा सकता।

कला सुंदर थी,
पर बाज़ार अंधा -
और उस अंधेपन में उसकी उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही थीं।

और उसी पल -
मुझे एहसास हुआ, मैं सिर्फ़ एक कला नहीं देख रही…

मैं उन हथेलियों का इंतज़ार देख रही थी,
जो हर टांके में अपनी ज़िंदगी बाँध सी देती हैं।

एक पल - एक जागृति

दिल में एक ख्याल जैसे अचानक चिंगारी बनकर उठा -

“अगर इन हाथों की मेहनत नहीं बिके,
तो मेरे घर की दीवाली किस काम की?”

सोचा -
क्यों न एक छोटा-सा "उम्मीद का मेला" लगाया जाए,
एक दुकान नहीं,
एक माँ की रोटी के नाम से
एक आँचल की इज़्ज़त के लिए।

एक प्रयास - एक चमत्कार

और फिर जैसे चमत्कार उतर आया -
लोग रुकने लगे,
देखने लगे,
पूछने लगे,
और फिर खरीदने भी लगे…

गीता की आँखों में आँसू आए,
पर इस बार टूटने के नहीं -
जीत के।

उस रात उसने कहा -
“आज लगा कि भगवान मेरे हाथों में वापस लौट आया है।”

एक अंत - एक शुरुआत

अगली सुबह वो गुजरात लौटी -
खाली झोले के साथ,
पर भरे दिल के साथ।

अपने बच्चों को गले लगाकर रोई -
इस बार दुःख से नहीं, गर्व से।

और मैंने उस दिन जाना -
नारीत्व सिर्फ़ जन्म नहीं देता,
वो दुनिया को उम्मीदें भी जन्म देता है।

Ortir India
एक सपना - एक उद्देश्य

यह कोई मंच नहीं -
किसी माँ की रोटी है।

यह दुकान नहीं -
किसी परिवार की उम्मीद है।

यह उत्पाद नहीं -
किसी संघर्ष की जीत है।

एक साधारण शाम,
एक सड़क किनारे,

एक झोले में सिमटी कला,
और एक गीता की चुप कहानी से।

Ortir India

मानवता के उस सफ़र से,
जहाँ कला बोलती है, और दिल सुनते हैं।

एक छत के नीचे -

Ortir India, जहाँ हर “गीता” अपनी कहानी कहती है।

क्या आप भी बनेंगे इस सफ़र का हिस्सा?
जहाँ ख़रीद सिर्फ़ सामान की नहीं,
रोटी, उम्मीद और गर्व की होती है।