जब घास ने आवाज़ पाई

दीवारों में सिमटी दुनिया

देवमती का जन्म एक छोटे गाँव में, एक गरीब दलित परिवार में हुआ—
जहाँ बेटियों के सपने बोलना सीखने से पहले ब्याह दिए जाते थे, और गरीबी फ़ैसले करती थी।

शिक्षा एक सुविधा  थी, और शादीसुरक्षा

बचपन अधूरा रह गया, और पत्नी होना सिखा दिया गया।

वह एक संघर्षरत घर से, दूसरे संघर्षरत घर पहुँची—
ख़ामोशी को विरासत की तरह ओढ़े हुए।

चुनाव कहीं नहीं था, सिर्फ़ निभाना था।

और उसकी दुनिया
परंपरा की ओट में, घर की दीवारों तक सिमटी थी।

माँ के हाथों मिली विरासत

देवमती ने मूंज बुनना, माँ के हाथों से सीखा।
कला नहीं, पहचान नहीं—बस वह काम,

जो औरतें करती हैं,
जब ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है—और वे पीछे रह जाती हैं।;

मूंज ने हाथ काटे,
हथेलियाँ सुखाईं, पीठ झुकाई।

तपती धूप में, जलती ज़मीन पर,
औरतें बुनती रहीं—क्योंकि शादियाँ आती थीं,
और परंपराएँ इंतज़ार नहीं करती थीं।

देवमती नहीं जानती थी—
यही कला एक दिन उसका सहारा बनेगी।

पहला कदम — परंपरा के बाहर

जिस दिन वह मूंज काटने निकली, पूरा गाँव रुककर देखने लगा।

नई बहू, बिना घूँघट; नंगे पाँव—और फुसफुसाहटें चलीं:
शर्म कहाँ है?”
“किस तरह की औरत है?”

पाँव जले, दिल काँपा, पर वह नहीं रुकी।

क्योंकि वह कदम
घास के लिए नहीं था—
ख़ुद को चुनने के लिए था।

बुनते हाथ, बदलती किस्मत

वह चुपचाप करती रही—
काटना, सुखाना, बुनना, बेचना

हर रुपया—ताने के साथ,
हर कदम—रोक के साथ।

फिर भी—
घर में चूल्हा जलने लगा,
ज़रूरतें पूरी होने लगीं।

और जीना
सम्मान-सा लगने लगा।

देखते-देखते नज़रें बदलीं;
जो सवाल करती थीं, अब सीखना चाहती थीं।

“हमें भी सिखाओ, बिना शोर,”
और देवमतीजवाब बन गई।

पीतल की चमक, मूंज की खामोशी

सखी की शादी पर, देवमती ने यादें बुनीं।

मूंज की खुशबू
खिचड़ी पर दूल्हे को: नोइया, सिखौला, बेना

पुरानी परंपरा थी—
हफ्तों की मेहनत, एक परंपरा के नाम।

पर हँसी आ गई; पीतल गिना गया।
चादरें लिखी गईं; मूंज—नहीं।

“ये तो न्योते में नहीं है।”

उसकी मेहनत अदृश्य कर दी गई।

वह मुस्कुराई—और चुप रही।

जो गाँव भूल गया, वह मूंज में बसा रहा

कभी औरतें, एक मौसम पहले, शादियाँ बुनती थीं।

छाले, धूप, सब्र

मूंज सस्ती नहीं थी—वह समय थी, मेहनत थी, और परंपरा थी।

गाँव भूल गया; देवमती नहीं।

घास, जो झुकी नहीं

मूंज घास है—
जब तक कोई औरत अपना जीवन उसमें न पिरो दे।

देवमती ने सिर्फ़ चीज़ें नहीं बनाईं;
उसने—एक ख़ामोश विरासत ज़िंदा रखी।

Ortir India

 

संघर्ष को सजाने नहीं, उसे सम्मान देने—
उन हाथों के साथ, जिनमें पीढ़ियाँ साँस लेती हैं।

देवमती की ख़ामोश क्रांति..

न नारे, न शोर—सिर्फ़ कदम,
सिर्फ़ बुनाई, सिर्फ़ हिम्मत।

और यही याद दिलाती है—कि कभी-कभी
सबसे बड़ी क्रांतियाँ
घास, पसीने
और अडिग इरादों से बनती हैं। 🌾